आखिर क्या खाते हैं स्वामी प्रेमानंद जी महाराज? उनका रोज़ाना भोजन जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे
स्वामी प्रेमानंद जी महाराज किस प्रकार का भोजन करते हैं? जानिए उनके सात्विक आहार, दिनचर्या, व्रत, संयम और आध्यात्मिक जीवन से जुड़ा भोजन रहस्य — पूरी जानकारी शुद्ध हिंदी में।
SPIRITUALITY
2/27/20261 min read
संतों का भोजन केवल भोजन नहीं, साधना का हिस्सा होता है
जब भी किसी संत या महात्मा की चर्चा होती है, लोगों के मन में यह जिज्ञासा अवश्य उठती है — वे क्या खाते हैं? क्या उनका भोजन साधारण लोगों जैसा होता है या बिल्कुल अलग?
इसी प्रकार अनेक श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न रहता है कि स्वामी प्रेमानंद जी महाराज किस प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं? क्या वे विशेष आहार लेते हैं? क्या वे केवल फलाहार करते हैं? या सामान्य भोजन करते हुए भी संयम बनाए रखते हैं?
दरअसल, संतों का भोजन उनके आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग होता है। वह केवल स्वाद या पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि साधना और मानसिक शांति के लिए ग्रहण किया जाता है।
सात्विक भोजन की परंपरा
भारतीय सनातन परंपरा में भोजन को तीन गुणों में विभाजित किया गया है:
सात्विक
राजसिक
तामसिक
सात्विक भोजन वह है जो मन को शुद्ध, शांत और स्थिर बनाए। संतजन प्रायः इसी प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं।
सात्विक भोजन में सामान्यतः शामिल होते हैं:
ताज़े फल
हरी सब्जियाँ
दालें
रोटी या सादा चावल
खिचड़ी
दूध एवं छाछ
सूखे मेवे सीमित मात्रा में
शुद्ध घी अल्प मात्रा में
इस प्रकार का भोजन पाचन में हल्का और मन को स्थिर रखने वाला माना जाता है।
स्वामी प्रेमानंद जी महाराज का संभावित दैनिक आहार
आध्यात्मिक जीवन जीने वाले संतों की दिनचर्या अनुशासित होती है। उनके भोजन में भी यही अनुशासन दिखाई देता है। सामान्यतः उनका भोजन इस प्रकार का हो सकता है:
प्रातःकाल
जागरण के बाद गुनगुना जल
कभी-कभी नींबू या शहद मिश्रित जल
हल्का फल या कुछ भी नहीं
सुबह का समय प्रायः जप, ध्यान और भजन में व्यतीत होता है। इसलिए भारी भोजन से बचा जाता है।
मध्याह्न भोजन
अधिकांश संत दिन में एक मुख्य भोजन ग्रहण करते हैं। यह भोजन सादा और सात्विक होता है:
सादी दाल
मौसमी सब्जी
1–2 रोटी
थोड़ा सा चावल
सलाद
छाछ
भोजन में अधिक मिर्च, मसाला या तला-भुना पदार्थ नहीं होता। मात्रा भी संयमित रहती है।
सायंकालीन आहार
कई संत सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते। यदि करते भी हैं तो बहुत हल्का:
फल
दूध
या पतली खिचड़ी
इसका उद्देश्य शरीर को हल्का रखना और रात्रि ध्यान में बाधा न आने देना होता है।
भोजन में संयम का महत्व
स्वामी प्रेमानंद जी जैसे संतों के जीवन में “मात्रा” अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अधिक भोजन करना आध्यात्मिक साधना में बाधा माना जाता है।
संयमित भोजन से:
आलस्य कम होता है
एकाग्रता बढ़ती है
शरीर हल्का रहता है
मन स्थिर होता है
इसलिए वे स्वाद से अधिक संतुलन को प्राथमिकता देते हैं।
व्रत और उपवास
संत जीवन में व्रत और उपवास का विशेष स्थान होता है। विशेष तिथियों, पर्वों या साधना काल में:
केवल फलाहार
या एक समय भोजन
या केवल जल
इस प्रकार का अनुशासन आत्मसंयम को मजबूत करता है और शरीर को भी विश्राम देता है।
तामसिक भोजन से दूरी
मांसाहार, अत्यधिक तला-भुना भोजन, बासी पदार्थ या अत्यधिक मसालेदार भोजन तामसिक माना गया है।
ऐसा भोजन:
मन में चंचलता बढ़ा सकता है
आलस्य उत्पन्न कर सकता है
ध्यान में बाधा डाल सकता है
इसलिए संतजन प्रायः इससे दूरी बनाए रखते हैं।
भोजन का भाव भी उतना ही महत्वपूर्ण
सिर्फ क्या खाया जा रहा है, यह ही महत्वपूर्ण नहीं — बल्कि कैसे खाया जा रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
संत परंपरा में भोजन करते समय:
शांत मन
कृतज्ञता भाव
भगवान को अर्पण करने की भावना
बिना विवाद या क्रोध के
इन सब बातों का ध्यान रखा जाता है।
धीरे-धीरे चबाकर भोजन करने से पाचन सुधरता है और मन भी स्थिर रहता है।
सरलता ही असली रहस्य है
लोग अक्सर सोचते हैं कि संतों का भोजन बहुत विशेष या रहस्यमय होता होगा। परंतु सच्चाई यह है कि उनका आहार अत्यंत सरल होता है।
न कोई विलासिता
न कोई प्रदर्शन
न कोई विशेष पकवान
सिर्फ सादगी।
क्या संत स्वाद त्याग देते हैं?
संत स्वाद का नहीं, बल्कि आसक्ति का त्याग करते हैं।
यदि भोजन स्वादिष्ट है परंतु सात्विक और संयमित है, तो वह स्वीकार्य है। समस्या तब होती है जब मन स्वाद का दास बन जाता है।
स्वामी प्रेमानंद जी जैसे संत संयम के माध्यम से संतुलन बनाए रखते हैं।
स्वास्थ्य और ऊर्जा का संबंध
सात्विक और संयमित भोजन के लाभ:
बेहतर पाचन
स्थिर ऊर्जा स्तर
मानसिक स्पष्टता
कम थकान
लंबी आयु
यही कारण है कि अनेक संत उच्च आयु तक सक्रिय और ऊर्जावान रहते हैं।
आम लोगों के लिए सीख
हर व्यक्ति संत जीवन नहीं जी सकता, परंतु कुछ आदतें अपनाई जा सकती हैं:
ताज़ा और घर का बना भोजन
रात में हल्का भोजन
सप्ताह में एक दिन फलाहार
भोजन के समय मोबाइल और टीवी से दूरी
अधिक मसाले और तेल से बचाव
छोटे बदलाव जीवन में बड़ा अंतर ला सकते हैं।
आखिर क्या है उनके भोजन का असली रहस्य?
यदि इस प्रश्न का एक वाक्य में उत्तर दिया जाए तो वह है —
सादगी, संयम और सात्विकता।
स्वामी प्रेमानंद जी महाराज का भोजन भले ही सामान्य लगे, परंतु उसका उद्देश्य असाधारण है — मन को स्थिर रखना और साधना में प्रगति करना।
अंतिम विचार
जब हम जानना चाहते हैं कि स्वामी प्रेमानंद जी क्या खाते हैं, तो वास्तव में हम यह समझना चाहते हैं कि वे इतना संतुलित जीवन कैसे जीते हैं।
उनके आहार का संदेश स्पष्ट है:
पेट भरने से पहले मन को शांत करें
स्वाद से पहले संतुलन चुनें
मात्रा से पहले मर्यादा रखें
भोजन यदि साधना बन जाए, तो जीवन स्वयं अनुशासित हो जाता है।


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