जिस क्षण श्रीकृष्ण ने पृथ्वी छोड़ी कुछ ऐसा हुआ जिसे बहुत कम लोग जानते हैं
जिस क्षण श्रीकृष्ण ने पृथ्वी छोड़ी, धर्म, मानव चेतना और संसार का संतुलन बदल गया। यह लेख उन गहरे रहस्यों को उजागर करता है जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं
SPIRITUALITY
2/4/20261 min read
जब ईश्वर मौन हो गए
जिस क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने इस पृथ्वी को छोड़ा, उस क्षण केवल एक अवतार का अंत नहीं हुआ —
एक युग समाप्त हो गया।
लोग सोचते हैं कि श्रीकृष्ण का जाना एक सामान्य देह त्याग था, लेकिन सत्य इससे कहीं अधिक गहरा, रहस्यमय और आत्मा को झकझोर देने वाला है।
धर्म, नीति, मानव चेतना और प्रकृति — सब कुछ उसी क्षण बदलने लगा।
क्या श्रीकृष्ण का जाना पहले से तय था
श्रीकृष्ण जानते थे कि उनका कार्य पूर्ण हो चुका है।
महाभारत समाप्त हो चुका था, अधर्म का नाश हो चुका था और धर्म को अंतिम दिशा मिल चुकी थी।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीकृष्ण का पृथ्वी छोड़ना मानव कर्मों का परिणाम भी था।
जब मनुष्य स्वयं विवेक छोड़ देता है, तब ईश्वर भी मार्गदर्शन देना बंद कर देते हैं।
वह क्षण जब श्रीकृष्ण ने देह त्यागी
वन में एक साधारण से दिखने वाले शिकारी द्वारा छोड़ा गया तीर —
लेकिन वह तीर केवल शरीर को नहीं लगा,
वह मानव युग के हृदय में लगा।
उस क्षण:
श्रीकृष्ण मुस्कुराए
कोई क्रोध नहीं
कोई पीड़ा नहीं
केवल मौन स्वीकार
यह संकेत था कि अब मनुष्य को अपने कर्मों का भार स्वयं उठाना होगा।
उसी क्षण क्या बदल गया
बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीकृष्ण के देह त्याग के साथ ही तीन स्तरों पर परिवर्तन शुरू हो गया।
1. धर्म का सहारा हट गया
जब तक श्रीकृष्ण थे, धर्म चलता था।
उनके जाने के बाद धर्म ग्रंथों में सिमटने लगा।
2. मानव विवेक कमजोर होने लगा
अब सही और गलत बताने वाला कोई प्रत्यक्ष मार्गदर्शक नहीं रहा।
3. कलियुग ने वास्तविक रूप लेना शुरू किया
कलियुग पहले से मौजूद था, लेकिन श्रीकृष्ण के जाने के बाद वह निर्भय हो गया।
द्वारका का डूबना केवल संयोग नहीं था
श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका का समुद्र में समा जाना केवल प्राकृतिक घटना नहीं थी।
यह संकेत था कि:
ईश्वरीय संरक्षण समाप्त हो चुका है
अब कोई दिव्य नगर नहीं रहेगा
मनुष्य को धरती पर ही संघर्ष करना होगा
द्वारका का डूबना एक चेतावनी थी —
जो ईश्वर से जुड़ा है, वही टिकता है।
पांडवों का पतन क्या दर्शाता है
श्रीकृष्ण के बिना पांडव भी नहीं टिक सके।
युधिष्ठिर का मोह
भीम का क्रोध
अर्जुन का आत्मविश्वास
द्रौपदी का दुख
सब कुछ एक-एक कर बिखर गया।
यह दिखाता है कि:
ईश्वर के बिना धर्म भी लड़खड़ा जाता है
देवताओं की भूमिका क्यों सीमित हो गई
श्रीकृष्ण के बाद देवताओं का हस्तक्षेप भी कम हो गया।
कारण स्पष्ट था:
मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी गई
कर्म का फल सीधा होना था
अब कोई चमत्कारिक बचाव नहीं
यही कारण है कि कलियुग में पीड़ा अधिक महसूस होती है।
मानव चेतना में सबसे बड़ा परिवर्तन
श्रीकृष्ण के रहते मनुष्य प्रश्न करता था।
उनके जाने के बाद मनुष्य भटकने लगा।
भक्ति में डर आया
धर्म में व्यापार आया
ज्ञान में अहंकार आया
यही वह मोड़ था जहाँ से:
सच्ची भक्ति दुर्लभ हो गई
आत्मज्ञान कठिन हो गया
क्या श्रीकृष्ण सच में चले गए
यह सबसे बड़ा रहस्य है।
श्रीकृष्ण ने शरीर छोड़ा,
तत्व नहीं छोड़ा।
जो प्रेम में हैं, वे आज भी उन्हें महसूस करते हैं।
जो अहंकार में हैं, उन्हें लगता है कि ईश्वर मौन हैं।
श्रीकृष्ण आज भी वहीं हैं —
कर्म में
विवेक में
आत्मा की आवाज़ में
कलियुग में श्रीकृष्ण को कैसे पहचानें
आज श्रीकृष्ण:
सही निर्णय की आवाज़ हैं
अधर्म से दूर रहने की प्रेरणा हैं
बिना फल की अपेक्षा किए कर्म करने की शक्ति हैं
जो इन्हें सुन लेता है, वही सुरक्षित रहता है।
Adhyatmik Shakti की दृष्टि से यह घटना
AdhyatmikShakti.com का मानना है कि श्रीकृष्ण का पृथ्वी छोड़ना कोई अंत नहीं था,
बल्कि मानव आत्मा की परीक्षा की शुरुआत थी।
यह वह क्षण था जब:
ईश्वर ने देखा कि मनुष्य अकेले कितना धर्म निभा सकता है
भक्ति दिखावे से ऊपर उठ पाएगी या नहीं
आत्मा सच में जागेगी या नहीं
आज के समय में इसका अर्थ क्या है
आज जब हम भ्रम, तनाव और लालच में फंसे हैं,
तो समझना होगा कि श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति नहीं,
हमारी अनसुनी समस्या है।
वे आज भी मार्ग दिखाते हैं —
बस शोर बहुत बढ़ गया है।
अंतिम सत्य
जिस क्षण श्रीकृष्ण ने पृथ्वी छोड़ी,
उस क्षण संसार से ईश्वर नहीं गए,
संसार से सहारा गया।
अब:
धर्म पुस्तक नहीं, अनुभव है
भक्ति डर नहीं, समझ है
मोक्ष पलायन नहीं, जागृति है
और यही श्रीकृष्ण का अंतिम उपदेश था।


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