ब्रह्मा, विष्णु और महेश को जन्म देने वाला कौन है? एक रहस्यमयी आध्यात्मिक सत्य | Adhyatmik Shakti
ब्रह्मा, विष्णु और महेश को जन्म देने वाला कौन है — क्या स्वयं उत्पन्न हुए या किसी ने उन्हें जन्म दिया? वेद, पुराण और उपनिषदों के अनुसार इस रहस्य का गूढ़ आध्यात्मिक सत्य क्या है? इस विशेष लेख में Adhyatmik Shakti के माध्यम से जानिए सृष्टि के सबसे बड़े रहस्य को।
SPIRITUALITY
1/8/20261 min read
भूमिका
हिंदू सनातन परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सृष्टि के तीन स्तंभ माना जाता है।
ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं,
विष्णु पालनकर्ता हैं,
और महेश (शिव) संहारकर्ता।
अधिकांश लोग यहीं तक जानते हैं।
लेकिन एक प्रश्न जो सदियों से साधकों, ऋषियों और जिज्ञासुओं को परेशान करता रहा है —
“जब ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, तो उन्हें किसने जन्म दिया?”
“विष्णु और महेश का मूल स्रोत कौन है?”
क्या त्रिदेव स्वयंभू हैं?
या फिर उनसे भी ऊपर कोई परम सत्ता है?
इस लेख में हम इसी रहस्य को वेद, उपनिषद, पुराण और आध्यात्मिक दृष्टि से समझने का प्रयास करेंगे।
त्रिदेव की अवधारणा को समझना आवश्यक क्यों है?
त्रिदेव को अक्सर अलग-अलग देवता मान लिया जाता है, लेकिन सनातन दर्शन में वे तीन शरीर नहीं, बल्कि तीन कार्य हैं।
सृष्टि (Creation)
स्थिति (Preservation)
संहार (Dissolution)
ये तीनों प्रक्रियाएँ निरंतर चलती रहती हैं।
इन प्रक्रियाओं को संचालित करने वाली शक्ति कौन है — यही मूल प्रश्न है।
क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयंभू हैं?
शास्त्रों में “स्वयंभू” शब्द का अर्थ होता है —
जो किसी भौतिक माता-पिता से जन्म न ले।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनका कोई मूल कारण नहीं है।
उपनिषद स्पष्ट कहते हैं:
“न तस्य कार्यं करणं च विद्यते”
उस परम सत्ता का न कोई कारण है, न कार्य।
इसका अर्थ यह है कि त्रिदेव स्वयं अंतिम सत्य नहीं हैं।
ब्रह्मा का जन्म कैसे हुआ?
पुराणों के अनुसार:
विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित थे।
उनकी नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ।
उसी कमल से ब्रह्मा का प्रकट होना हुआ।
यह कथा प्रतीकात्मक है।
यह दर्शाती है कि ब्रह्मा का उद्भव विष्णु से हुआ, लेकिन फिर प्रश्न उठता है —
विष्णु का उद्भव किससे हुआ?
विष्णु और महेश का मूल स्रोत
वेद और उपनिषद इस विषय पर अत्यंत स्पष्ट हैं।
ऋग्वेद कहता है:
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
इसका अर्थ है —
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन अलग सत्ता नहीं, बल्कि एक ही परम तत्व की अभिव्यक्ति हैं।
वह परम तत्व कौन है?
उपनिषद उसे अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं:
परब्रह्म
निराकार ब्रह्म
सत-चित-आनंद
अद्वैत चेतना
महाशक्ति
यह सत्ता:
न जन्म लेती है
न मरती है
न आकार में बंधी है
न किसी लोक तक सीमित है
क्या आदि शक्ति ने त्रिदेव को जन्म दिया?
देवी भागवत पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि महाशक्ति ही सृष्टि की जननी हैं।
शक्ति के बिना शिव भी शव हैं —
यह वाक्य केवल प्रतीक नहीं, बल्कि दर्शन है।
अर्थात:
ब्रह्मा = शक्ति + ज्ञान
विष्णु = शक्ति + पालन
शिव = शक्ति + संहार
तीनों का अस्तित्व शक्ति से है।
शिव से विष्णु या विष्णु से शिव?
यह विवाद केवल बाहरी दृष्टि से है।
शैव ग्रंथ शिव को सर्वोच्च कहते हैं,
वैष्णव ग्रंथ विष्णु को।
लेकिन अद्वैत वेदांत कहता है:
शिव और विष्णु अलग नहीं हैं।
वे एक ही चेतना के दो रूप हैं।
उपनिषद क्या कहते हैं?
कठोपनिषद में कहा गया है:
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह”
जिसे शब्द और मन भी नहीं पकड़ सकते —
वही परम सत्ता है।
अर्थात त्रिदेव भी उस परम तत्व की पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकते।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीन नहीं, एक
आध्यात्मिक दृष्टि से:
ब्रह्मा = सृजनात्मक चेतना
विष्णु = संतुलनात्मक चेतना
महेश = विलयनात्मक चेतना
ये तीनों हमारे भीतर भी कार्य करते हैं।
मनुष्य के भीतर त्रिदेव
जब कोई विचार जन्म लेता है — ब्रह्मा
जब वह विचार स्थिर रहता है — विष्णु
जब वह विचार समाप्त होता है — महेश
इसलिए त्रिदेव बाहर नहीं, भीतर हैं।
अंतिम सत्य क्या है?
त्रिदेव का जन्म किसी व्यक्ति से नहीं हुआ।
वे उत्पन्न हुए हैं परम चेतना से।
उस चेतना का कोई नाम नहीं —
नाम हमने दिए हैं।
क्या यही ईश्वर है?
ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं,
ईश्वर एक अवस्था है।
जब चेतना पूर्ण होती है — वही ईश्वर है।
कलियुग में इस ज्ञान का महत्व
आज का मनुष्य बाहरी देवता ढूँढ रहा है,
जबकि सत्य उसके भीतर है।
जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि:
ब्रह्मा, विष्णु, महेश हमारे भीतर हैं
और उनका स्रोत भी हमारे भीतर है
तब तक मुक्ति संभव नहीं।
निष्कर्ष
ब्रह्मा, विष्णु और महेश को जन्म देने वाला कोई मानव, देव या लोक नहीं है।
उनका मूल स्रोत है — परम चेतना, आदि शक्ति, निराकार ब्रह्म।
यही सनातन सत्य है।
यही वेदों का निष्कर्ष है।
यही आध्यात्मिक शास्त्रों का सार है।


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