जिस दिन यमराज एक बालक को लेने आए — और शिव ने समय ही रोक दिया
मार्कंडेय, यमराज और शिव की यह रहस्यमयी कहानी केवल पौराणिक कथा नहीं है। यह बताती है कि भक्ति, भय और मृत्यु के बीच वास्तव में क्या होता है।
SPIRITUALITY
2/8/20261 min read
यह कहानी क्यों आज भी लोगों को बेचैन कर देती है
कुछ कहानियाँ सिर्फ़ सुनी नहीं जातीं।
वे मन के अंदर उतर जाती हैं।
मार्कंडेय की यह कथा भी वैसी ही है।
यह मृत्यु की कहानी है,
लेकिन अंत में मृत्यु हार जाती है।
यह भक्ति की कहानी है,
लेकिन भक्ति यहाँ शोर नहीं करती,
वह डर के बीच भी शांत रहती है।
और सबसे ज़रूरी बात —
यह कहानी हमें यह सवाल पूछने पर मजबूर करती है:
क्या मृत्यु सच में अंतिम है?
एक पिता का वरदान और उसके पीछे छिपा भय
बहुत समय पहले, एक ऋषि थे।
उनका जीवन तप, संयम और साधना से भरा था।
लेकिन एक चीज़ अधूरी थी —
उनके जीवन में संतान नहीं थी।
उन्होंने वर्षों तक तप किया।
आख़िरकार उन्हें वरदान मिला।
पर वरदान के साथ एक कठोर शर्त थी।
या तो पुत्र दीर्घायु होगा लेकिन साधारण,
या फिर अल्पायु होगा लेकिन महान।
ऋषि ने बिना देर किए कहा —
“मुझे महान पुत्र चाहिए।”
और उसी क्षण, भविष्य लिख दिया गया।
मार्कंडेय: जिसे मृत्यु की तारीख पता थी
उस बालक का नाम था मार्कंडेय।
वह सामान्य बच्चों जैसा नहीं था।
उसकी आँखों में चंचलता कम और गहराई ज़्यादा थी।
उसे बचपन से ही पता था —
उसकी आयु सीमित है।
सोचिए,
एक बच्चा जो यह जानकर बड़ा हो रहा हो कि
उसकी मृत्यु निश्चित है।
लेकिन यहाँ कहानी बदलती है।
मार्कंडेय डरता नहीं है।
वह शिकायत नहीं करता।
वह प्रश्न नहीं करता।
वह बस शिव की शरण में चला जाता है।
जब बाकी दुनिया खेल रही थी, वह शिव का नाम जप रहा था
मार्कंडेय का जीवन एक ही दिशा में था —
शिव।
वह खेल नहीं चाहता था।
वह सुख नहीं चाहता था।
वह लंबी आयु की माँग भी नहीं करता था।
उसकी भक्ति सौदेबाज़ी नहीं थी।
वह शिवलिंग के पास बैठकर घंटों ध्यान करता।
उसका मन कहीं भटकता नहीं।
उसकी भक्ति शांत थी,
लेकिन बेहद गहरी।
वह दिन जब समय थमने लगा
जिस दिन मार्कंडेय की आयु पूरी होनी थी,
वह दिन बाकी दिनों जैसा नहीं था।
हवा भारी थी।
आकाश असामान्य रूप से शांत था।
और फिर —
मृत्यु आई।
यमराज स्वयं आए।
कोई क्रोध नहीं।
कोई घमंड नहीं।
केवल कर्तव्य।
यमराज और वह प्रश्न जो उन्होंने नहीं पूछा
यमराज ने बालक को देखा।
एक बच्चा।
निहत्था।
निर्भय।
लेकिन यमराज सवाल नहीं करते।
मृत्यु को जवाब नहीं चाहिए।
उसे केवल आत्मा चाहिए।
उन्होंने अपना पाश उठाया।
जब बालक ने शिवलिंग को पकड़ लिया
जैसे ही पाश आगे बढ़ा,
मार्कंडेय ने कुछ असाधारण किया।
वह भागा नहीं।
वह रोया नहीं।
उसने शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया।
उसकी आँखें बंद थीं।
मुख पर कोई भय नहीं था।
केवल एक भाव था —
“अब जो होगा, शिव तय करेंगे।”
वह क्षण जब नियम टूट गए
यमराज का पाश
केवल बालक को नहीं,
शिवलिंग को भी छू गया।
और यहीं नियम टूटे।
जिस वस्तु को मृत्यु छुए,
वह नष्ट हो —
यह नियम था।
लेकिन यहाँ मृत्यु ने
शिव को छू लिया था।
शिव प्रकट हुए — क्रोध नहीं, चेतावनी के साथ
उस क्षण
शिव प्रकट हुए।
कोई युद्धघोष नहीं।
कोई शोर नहीं।
लेकिन ब्रह्मांड काँप गया।
शिव का स्वर कठोर था।
“यह बालक मेरी शरण में है।”
यह वाक्य
मृत्यु से भी बड़ा था।
यमराज का झुकना
यमराज ने तर्क नहीं दिया।
उन्होंने आदेश नहीं झेला।
उन्होंने अपना पाश नीचे रखा।
क्योंकि यह युद्ध नहीं था।
यह धर्म का स्मरण था।
शिव ने मृत्यु को नहीं हराया।
उन्होंने उसे उसकी सीमा याद दिलाई।
अमरता नहीं, अपराजेयता का वरदान
मार्कंडेय को अमर नहीं बनाया गया।
उसे यह वरदान मिला —
“जो शिव की शरण में होगा,
मृत्यु उसके लिए भय नहीं बनेगी।”
यह कहानी अमर होने की नहीं है।
यह डर से मुक्त होने की कहानी है।
यह कथा आज भी क्यों प्रासंगिक है
आज भी लोग मृत्यु से डरते हैं।
भविष्य से डरते हैं।
असफलता से डरते हैं।
मार्कंडेय की कथा यह नहीं कहती कि
मृत्यु नहीं आएगी।
यह कहती है —
अगर भीतर भक्ति है,
तो मृत्यु भी तुम्हें नहीं तोड़ सकती।
अंतिम विचार: यह कहानी आपके लिए क्या छोड़ती है
यह कहानी पूछती है:
अगर मृत्यु सामने आ जाए,
तो तुम भागोगे
या किसी सत्य को थाम लोगे?
मार्कंडेय ने शिवलिंग पकड़ा।
आज का मनुष्य किसे पकड़ेगा?
यही प्रश्न
इस कथा को जीवित रखता है।


© 2025. All rights reserved.


