क्या भगवान भी मर सकते हैं? यह सच सुनकर आपकी आस्था हिल जाएगी!
क्या भगवान जन्म लेते हैं और मर जाते हैं? क्या श्रीराम और श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई थी? जानिए शास्त्रों, वेदों और गीता के अनुसार भगवान के जन्म और मृत्यु का सबसे बड़ा रहस्य।क्या भगवान भी मर सकते हैं
SPIRITUALITY
2/18/20261 min read
क्या सच में भगवान मरते हैं या यह हमारी समझ की गलती है?
यह सवाल सदियों से लोगों को परेशान करता रहा है।
जब हम सुनते हैं कि श्रीराम जी ने सरयू नदी में जल-समाधि ली
या कि श्रीकृष्ण को बाण लगा और उनका देहांत हुआ,
तो मन में एक ही सवाल उठता है:
अगर भगवान भी मरते हैं, तो फिर वे भगवान कैसे हुए?
क्या ईश्वर भी इंसानों की तरह जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं?
या फिर जो हम “मृत्यु” समझते हैं, वह वास्तव में कुछ और है?
आज हम इसी रहस्य को खोलेंगे — धर्म, दर्शन और शास्त्रों की दृष्टि से।
मृत्यु क्या है? पहले यह समझिए
मृत्यु का अर्थ है — शरीर का अंत।
लेकिन क्या शरीर ही सब कुछ है?
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
“न जायते म्रियते वा कदाचित्”
अर्थात आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है।
यदि आत्मा अमर है, तो फिर भगवान — जो आत्मा के भी स्वामी हैं — कैसे मर सकते हैं?
भगवान और अवतार में अंतर
सबसे बड़ी गलतफहमी यहीं होती है।
भगवान स्वयं निराकार, अनंत और अजन्मा माने जाते हैं।
लेकिन जब वे पृथ्वी पर अवतार लेते हैं, तब वे मानव शरीर धारण करते हैं।
शरीर नश्वर है।
लेकिन ईश्वर नहीं।
उदाहरण के लिए:
भगवान श्रीराम एक अवतार थे।
भगवान श्रीकृष्ण भी अवतार थे।
उनका शरीर समाप्त हुआ, लेकिन क्या उनकी दिव्यता समाप्त हुई?
नहीं।
शास्त्र कहते हैं कि अवतार का “प्रस्थान” होता है, मृत्यु नहीं।
श्रीराम की मृत्यु या लीला?
कहा जाता है कि श्रीराम ने अंत समय में सरयू नदी में प्रवेश कर वैकुंठ धाम को प्रस्थान किया।
क्या यह सामान्य मृत्यु थी?
नहीं।
धार्मिक ग्रंथ इसे “देह त्याग” कहते हैं।
देह त्याग और मृत्यु में अंतर है।
मृत्यु अनिवार्य है।
देह त्याग स्वेच्छा से होता है।
श्रीकृष्ण की मृत्यु का रहस्य
महाभारत के अंत में वर्णन मिलता है कि एक शिकारी के बाण से श्रीकृष्ण के पैर में चोट लगी।
यह घटना देखने में सामान्य लगती है।
लेकिन क्या भगवान वास्तव में एक बाण से मर सकते हैं?
दर्शन कहता है:
यह उनकी लीला थी — संसार को यह दिखाने के लिए कि अवतार का कार्य पूर्ण हो चुका है।
उनकी आत्मा या परम स्वरूप का नाश नहीं हुआ।
यदि भगवान अमर हैं, तो वे शरीर क्यों धारण करते हैं?
यह प्रश्न और भी गहरा है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति…”
जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं अवतार लेता हूँ।
अवतार का उद्देश्य है — धर्म की स्थापना।
जब उद्देश्य पूरा हो जाता है, तो वे शरीर त्याग देते हैं।
लेकिन वह त्याग मृत्यु नहीं है।
क्या सभी धर्मों में भगवान अमर माने जाते हैं?
लगभग सभी प्रमुख धर्म ईश्वर को अमर और अनंत मानते हैं।
इस्लाम में अल्लाह को अजन्मा और अमर बताया गया है।
ईसाई धर्म में ईश्वर को अनंत कहा गया है।
सनातन धर्म में ब्रह्म को नित्य, शाश्वत और अविनाशी बताया गया है।
मृत्यु केवल सृष्टि के नियमों में बंधी चीज़ों के लिए है।
ईश्वर सृष्टि के नियमों के निर्माता हैं, उनके अधीन नहीं।
फिर लोगों को भ्रम क्यों होता है?
क्योंकि हम शरीर को ही वास्तविकता मान लेते हैं।
हम देखते हैं कि भगवान की मूर्ति टूट सकती है।
हम सुनते हैं कि अवतार का अंत हुआ।
तो हम मान लेते हैं कि भगवान मर गए।
लेकिन दर्शन कहता है:
जो दिखता है वह पूर्ण सत्य नहीं।
ईश्वर का अस्तित्व शरीर तक सीमित नहीं।
क्या भगवान को भी मृत्यु का भय होता है?
यदि भगवान मृत्यु से डरें, तो वे भगवान नहीं रहेंगे।
भय सीमित अस्तित्व का गुण है।
ईश्वर असीम हैं।
जहाँ सीमा नहीं, वहाँ अंत नहीं।
जहाँ अंत नहीं, वहाँ मृत्यु नहीं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या कहता है?
विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध या खंडित करने में पूर्ण रूप से सक्षम नहीं है।
लेकिन विज्ञान यह मानता है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती — केवल रूप बदलती है।
यदि साधारण ऊर्जा नष्ट नहीं होती, तो क्या परम ऊर्जा नष्ट हो सकती है?
यह प्रश्न खुला है।
असली सच क्या है?
भगवान मरते नहीं।
शरीर मरता है।
अवतार का उद्देश्य पूरा होता है।
लीला समाप्त होती है।
परम सत्ता शाश्वत रहती है।
सबसे बड़ा निष्कर्ष
जब हम कहते हैं “भगवान की मृत्यु हो गई”
तो हम वास्तव में एक दिव्य लीला का अंत देख रहे होते हैं।
ईश्वर जन्म और मृत्यु के चक्र से परे हैं।
वे समय के भी स्वामी हैं।
समय उन्हें नहीं बाँधता।
अंतिम विचार
यह प्रश्न केवल आस्था का नहीं, आत्म-चिंतन का है।
यदि ईश्वर अमर हैं,
तो हमारी आत्मा भी उसी अनंत तत्व का अंश है।
मृत्यु अंत नहीं, परिवर्तन है।
भगवान का सत्य स्वरूप न जन्म लेता है, न मरता है।
और शायद यही वह बात है जो हमारी आस्था को हिलाती भी है और मजबूत भी करती है।


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