कलियुग में भगवान दिखाई नहीं देते क्योंकि समस्या आस्था की नहीं, हमारी दृष्टि की है। जानिए वह सबसे बड़ी वजह जो ईश्वर से दूरी बना रही है।
कलियुग में भगवान को खोज रहे हैं, मंदिर जा रहे हैं, पूजा-पाठ कर रहे हैं, फिर भी उन्हें ईश्वर का अनुभव क्यों नहीं होता? क्या सच में भगवान दूर हो गए हैं या हमारी समझ कहीं भटक गई है?
SPIRITUALITY
1/7/20261 min read
भूमिका: खोज बहुत है, दर्शन क्यों नहीं?
आज के कलियुग में शायद ही कोई ऐसा हो जो कभी न कभी भगवान को न खोजता हो।
कोई मंदिर जाता है,
कोई पूजा-पाठ करता है,
कोई व्रत रखता है,
तो कोई तीर्थ यात्राओं में जीवन बिता देता है।
फिर भी एक प्रश्न हर मन में उठता है—
“भगवान दिखाई क्यों नहीं देते?”
क्या भगवान इस युग में छुप गए हैं?
क्या ईश्वर केवल शास्त्रों तक सीमित रह गए हैं?
या फिर समस्या कहीं और है?
सत्य यह है कि भगवान को न देख पाने की वजह भगवान नहीं, हम स्वयं हैं।
भगवान को न देख पाने की सबसे बड़ी वजह: अशांत और अहंकारी मन
कलियुग में भगवान को न देख पाने की सबसे बड़ी वजह है—
मन का अशांत होना और अहंकार से भरा होना
जब तक मन—
इच्छाओं से भरा है
अपेक्षाओं में उलझा है
तुलना, भय और क्रोध से ग्रस्त है
“मैं” की भावना से बंधा है
तब तक ईश्वर की अनुभूति संभव नहीं।
भगवान शोर में नहीं, मौन में मिलते हैं।
और कलियुग का मन मौन से सबसे अधिक डरता है।
अहंकार: ईश्वर और मनुष्य के बीच दीवार
अहंकार का अर्थ केवल घमंड नहीं होता।
अहंकार का अर्थ है—“मैं अलग हूँ”
मैं जानता हूँ
मैं सही हूँ
मैं बड़ा भक्त हूँ
मैं धार्मिक हूँ
जब तक “मैं” है, तब तक “वह” नहीं है।
भगवान के दर्शन का पहला द्वार है—अहंकार का विसर्जन।
कलियुग में लोग भगवान को बाहर क्यों ढूँढते हैं
आज का मनुष्य भगवान को—
चमत्कारों में ढूँढता है
मूर्तियों में सीमित करता है
घटनाओं से प्रमाण चाहता है
कठिन समय में सौदा करता है
जबकि शास्त्र कहते हैं—
ईश्वर अनुभूति हैं, प्रदर्शन नहीं।
जो व्यक्ति भगवान को बाहर खोजता है, वह भीतर कभी नहीं झाँकता।
भक्ति दिखावा बन गई, अनुभूति नहीं
कलियुग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि—
पूजा है, पर भावना नहीं
भजन है, पर समर्पण नहीं
व्रत है, पर करुणा नहीं
धर्म है, पर विवेक नहीं
भगवान विधि से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं।
सूचना का बोझ, साधना का अभाव
2026 में मनुष्य के पास—
ज्ञान बहुत है
जानकारी बहुत है
प्रवचन बहुत हैं
लेकिन—
ध्यान नहीं है
आत्मचिंतन नहीं है
स्थिरता नहीं है
भगवान को देखने के लिए ज्ञान नहीं, शांत चित्त चाहिए।
भगवान के दर्शन का वास्तविक अर्थ
अधिकांश लोग समझते हैं कि दर्शन का अर्थ है—
भगवान को आँखों से देख लेना
जबकि वास्तविक दर्शन का अर्थ है—
भीतर शांति उतर आना
भय का मिट जाना
अहंकार का टूट जाना
जीवन का सरल हो जाना
यदि आपके भीतर शांति आई है,
तो समझिए भगवान के दर्शन हो चुके हैं।
कर्म और चरित्र का पतन भी कारण है
भगवान केवल पूजा से नहीं, जीवन से प्रसन्न होते हैं।
यदि—
जीवन में छल है
कर्म में बेईमानी है
व्यवहार में कठोरता है
सत्य से दूरी है
तो केवल मंत्रों से ईश्वर प्रकट नहीं होते।
धर्म और आचरण का मेल आवश्यक है।
कलियुग में भगवान कहाँ मिलते हैं
भगवान आज भी उतने ही पास हैं जितने हर युग में थे।
वे मिलते हैं—
सच्ची सेवा में
करुणा में
क्षमा में
सत्य में
मौन में
जो व्यक्ति इन गुणों को जीवन में उतारता है, वही ईश्वर को “देखता” है।
संतों की वाणी क्या कहती है
संतों ने हमेशा कहा है—
“भगवान को देखने की इच्छा छोड़ दो,
स्वयं को बदलना शुरू करो।”
परिवर्तन के साथ-साथ दर्शन अपने आप होने लगते हैं।
आध्यात्मिक शक्ति का दृष्टिकोण
Adhyatmik Shakti का स्पष्ट मत है कि—
आध्यात्म दिखावा नहीं, जीवन-पद्धति है
भगवान दूर नहीं, हमारी समझ धुंधली है
सच्चा धर्म मनुष्य को बेहतर बनाता है
आध्यात्म का उद्देश्य चमत्कार नहीं, चरित्र निर्माण है।
भगवान क्यों चुप लगते हैं
भगवान चुप नहीं हैं।
हम शोर में हैं।
मन का शोर—
इच्छाओं का
डर का
तुलना का
असंतोष का
जब यह शोर थमता है, तभी ईश्वर की आवाज़ सुनाई देती है।
भगवान को देखने का सबसे सरल मार्ग
कलियुग में भगवान को देखने का सबसे सरल मार्ग है—
अहंकार छोड़ना
मन को शांत करना
सेवा को जीवन बनाना
अपेक्षा त्यागना
भीतर झाँकना
भगवान को पाने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता,
खुद से हटना पड़ता है।
निष्कर्ष: भगवान नहीं छुपे, हम भटके हैं
कलियुग में भगवान को न देख पाने की सबसे बड़ी वजह यह है कि—
हम बाहर बहुत देखते हैं,
और भीतर बिल्कुल नहीं।
जिस दिन मन शांत हुआ,
जिस दिन “मैं” टूटा,
जिस दिन जीवन सरल हुआ—
उसी दिन भगवान के दर्शन हो जाते हैं।
भगवान आज भी यहीं हैं।
बस देखने वाली दृष्टि चाहिए।


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