कलयुग की शुरुआत कैसे हुई: धर्म, अधर्म और मानव चेतना का युगांत
कलयुग की शुरुआत कैसे हुई, इसका रहस्य क्या है और यह युग मानव जीवन, धर्म, कर्म और चेतना को कैसे प्रभावित करता है—इस विस्तृत आध्यात्मिक लेख में जानिए पुराणों, महाभारत और सनातन परंपरा के अनुसार कलयुग का सत्य। आध्यात्मिक शक्ति के दृष्टिकोण से प्रस्तुत एक गहन विवेचना।
SPIRITUALITY
1/23/20261 min read
भूमिका: युगों का चक्र और कलयुग का प्रश्न
सनातन धर्म के अनुसार समय रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय है। सृष्टि का संचालन चार महान युगों—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग—के माध्यम से होता है। प्रत्येक युग का अपना स्वभाव, धर्म की स्थिति और मानव चेतना का स्तर होता है। आज हम जिस युग में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसे कलयुग कहा जाता है। यह युग अक्सर पतन, अधर्म, भ्रम और नैतिक गिरावट से जोड़ा जाता है।
परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यह है—कलयुग की शुरुआत कैसे हुई? क्या यह केवल समय का परिणाम था, या इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक कारण छिपे हैं? इस लेख में आध्यात्मिक शक्ति के दृष्टिकोण से हम इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे।
युगों की संक्षिप्त व्याख्या
सनातन शास्त्रों के अनुसार चारों युगों की अवधि और विशेषताएँ भिन्न-भिन्न हैं।
सतयुग में धर्म चारों चरणों में स्थापित था। सत्य, करुणा, तप और ज्ञान मानव जीवन के आधार थे।
त्रेतायुग में धर्म का एक चरण कम हो गया, फिर भी मर्यादा और कर्तव्य प्रमुख रहे।
द्वापरयुग में धर्म दो चरणों पर टिक गया। यहां भक्ति और युद्ध दोनों का उदय हुआ।
कलयुग में धर्म केवल एक चरण पर रह गया, और अधर्म की प्रधानता बढ़ने लगी।
युगों का यह पतन केवल बाहरी नहीं, बल्कि मानव चेतना के स्तर में भी गिरावट का संकेत है।
द्वापरयुग का अंत और महाभारत का युद्ध
कलयुग की शुरुआत को समझने के लिए द्वापरयुग के अंत को समझना अनिवार्य है। द्वापरयुग का सबसे बड़ा और निर्णायक घटनाक्रम था—महाभारत का युद्ध। यह केवल एक राजनैतिक युद्ध नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच अंतिम संघर्ष था।
जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए यह लीला रची। कौरवों का अहंकार, अन्याय, द्रौपदी का अपमान, और सत्य की अवहेलना—ये सभी संकेत थे कि द्वापरयुग समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।
महाभारत युद्ध के समाप्त होते ही द्वापरयुग की आत्मा भी क्षीण हो चुकी थी।
भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी से प्रस्थान
सनातन ग्रंथों के अनुसार, कलयुग की वास्तविक शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के साथ मानी जाती है। श्रीकृष्ण केवल एक अवतार नहीं थे, वे धर्म का सजीव स्वरूप थे। जब तक वे पृथ्वी पर उपस्थित रहे, तब तक धर्म की रक्षा स्वयं उनकी चेतना से होती रही।
उनके प्रस्थान के साथ ही वह दिव्य संरक्षण समाप्त हो गया। यही वह क्षण था जब कलयुग ने पूर्ण रूप से पृथ्वी पर प्रवेश किया।
आध्यात्मिक शक्ति के अनुसार, श्रीकृष्ण का जाना केवल एक शरीर का अंत नहीं था, बल्कि मानवता से दिव्य मार्गदर्शन का हट जाना था।
कलयुग का प्रतीकात्मक प्रवेश
पुराणों में वर्णित है कि कलयुग स्वयं एक प्रतीकात्मक सत्ता है। जब श्रीकृष्ण ने पृथ्वी छोड़ी, तब कलयुग को प्रवेश की अनुमति मिली। कलयुग ने सबसे पहले उन स्थानों को चुना जहाँ:
जुआ खेला जाता था
मदिरा का सेवन होता था
असत्य और छल प्रचलित थे
हिंसा और वासना को बढ़ावा मिलता था
धीरे-धीरे यही प्रवृत्तियाँ समाज के केंद्र में आ गईं।
कलयुग के प्रमुख लक्षण
सनातन ग्रंथों में कलयुग के जो लक्षण बताए गए हैं, वे आज के समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
सत्य दुर्लभ हो जाता है
धन को ही शक्ति माना जाता है
रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हो जाते हैं
धर्म केवल दिखावे तक सीमित रह जाता है
गुरु और शिष्य का संबंध कमजोर हो जाता है
अहंकार ज्ञान से बड़ा हो जाता है
आध्यात्मिक शक्ति यह मानती है कि ये सभी लक्षण बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना के पतन का परिणाम हैं।
क्या कलयुग केवल नकारात्मक है?
अधिकांश लोग कलयुग को अंधकारमय युग मानते हैं, परंतु शास्त्रों में इसका एक दूसरा पक्ष भी बताया गया है।
सतयुग में मोक्ष प्राप्त करने के लिए वर्षों का तप आवश्यक था।
त्रेतायुग में बड़े यज्ञ करने पड़ते थे।
द्वापरयुग में विधिवत पूजा आवश्यक थी।
कलयुग में केवल सच्चे मन से नामस्मरण ही पर्याप्त है।
यह कलयुग की सबसे बड़ी विशेषता है।
आध्यात्मिक शक्ति के अनुसार, यह युग पतन का नहीं, बल्कि चेतना के तीव्र जागरण का अवसर भी है।
मानव चेतना और कलयुग
कलयुग में बाहरी संसाधन बढ़े हैं, परंतु आंतरिक शांति घट गई है। तकनीक ने सुविधा दी, परंतु ध्यान छीन लिया। ज्ञान उपलब्ध है, परंतु विवेक दुर्लभ है।
यह युग मानव को बार-बार यह प्रश्न पूछने पर मजबूर करता है—मैं कौन हूँ? मेरा उद्देश्य क्या है?
यही प्रश्न आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत है।
कलयुग और कर्म सिद्धांत
कलयुग में कर्म का फल अत्यंत शीघ्र मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, इस युग में किया गया छोटा सा पुण्य भी बड़ा फल देता है, और किया गया छोटा सा पाप भी तत्काल प्रभाव दिखाता है।
इसी कारण कलयुग को “तीव्र कर्मफल का युग” कहा गया है।
आध्यात्मिक शक्ति का दृष्टिकोण
आध्यात्मिक शक्ति यह मानती है कि कलयुग कोई दंड नहीं, बल्कि एक परीक्षा है। यह युग हमें बाहरी सहारे से मुक्त कर आंतरिक शक्ति पहचानने का अवसर देता है।
जब समाज टूटता है, तब आत्मा खोज शुरू करती है।
जब सत्य दुर्लभ होता है, तब साधक जन्म लेते हैं।
कलयुग संतों, विचारकों और जाग्रत आत्माओं का युग भी है।
कलयुग से भय या जागरण?
कलयुग से डरने के बजाय उसे समझना आवश्यक है। यह युग हमें बताता है कि—
धर्म केवल कर्मकांड नहीं है
ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है
मुक्ति किसी युग की बपौती नहीं
जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, उसके लिए कलयुग भी मोक्ष का द्वार बन सकता है।
निष्कर्ष: कलयुग की शुरुआत और हमारा उत्तरदायित्व
कलयुग की शुरुआत द्वापरयुग के अंत, महाभारत युद्ध और भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्थान से हुई। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि यह युग केवल अंधकार का प्रतीक है।
यह युग हमें आत्मनिर्भर आध्यात्मिक बनने की चुनौती देता है। आध्यात्मिक शक्ति के अनुसार, कलयुग वह दर्पण है जिसमें मानव अपनी वास्तविक स्थिति देख सकता है।
यदि हम चेतना को ऊँचा उठाएँ, सत्य को अपनाएँ और कर्म को शुद्ध करें, तो कलयुग भी हमारे लिए मुक्ति का मार्ग बन सकता है।


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