क्यों नहीं होती ब्रह्मा जी की पूजा? जानिए सृष्टि रचयिता की उपासना से जुड़ा दिव्य रहस्य
ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं, फिर भी उनकी पूजा क्यों नहीं होती? Adhyatmik Shakti के इस विशेष लेख में जानिए इसके पीछे के पौराणिक, कर्मिक और आध्यात्मिक कारण।क्यों नहीं होती ब्रह्मा जी की पूजा
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1/26/20261 min read
भूमिका: सृष्टि के रचयिता और पूजा का प्रश्न
सनातन धर्म में जब भी त्रिदेवों का उल्लेख होता है, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नाम एक साथ लिया जाता है।
ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता माना गया है, जिनके बिना इस जगत की कल्पना संभव नहीं। फिर भी यह एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमय तथ्य है कि आज के समय में ब्रह्मा जी के मंदिर बहुत कम हैं और उनकी नियमित पूजा लगभग नहीं होती।
यह प्रश्न केवल सामान्य जिज्ञासा नहीं है, बल्कि यह आत्मा, कर्म और मोक्ष से जुड़ा एक गहन आध्यात्मिक रहस्य है।
Adhyatmik Shakti के इस लेख में हम इसी रहस्य की परत-दर-परत विवेचना करेंगे।
ब्रह्मा जी कौन हैं? सृष्टि की मूल ऊर्जा
ब्रह्मा जी को चार मुखों वाला देवता कहा गया है, जो चारों वेदों के प्रतीक हैं।
उनका कार्य है — सृजन।
उन्होंने पंचतत्व, जीव, प्रकृति और समय की रचना की।
लेकिन सनातन दर्शन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है —
जो रचता है, वह बंधन में भी डालता है।
सृष्टि का निर्माण कर्म, इच्छा और माया से होता है।
यहीं से ब्रह्मा जी की भूमिका सीमित हो जाती है।
पहला कारण: ब्रह्मा जी का कार्य केवल सृजन तक सीमित
सनातन धर्म में तीन प्रमुख शक्तियाँ मानी जाती हैं:
सृजन (ब्रह्मा)
संरक्षण (विष्णु)
संहार और मुक्ति (महेश)
मनुष्य की अंतिम चाह मोक्ष है।
मोक्ष न सृजन से मिलता है, न भोग से, बल्कि बंधन के विनाश से मिलता है।
ब्रह्मा जी सृष्टि रचते हैं, लेकिन
वे जीव को मुक्त नहीं करते।
इसी कारण साधक और भक्त उन देवताओं की ओर आकर्षित होता है जो उद्धार और मुक्ति प्रदान करते हैं।
दूसरा कारण: अहंकार और परीक्षा की कथा
पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा आती है—
एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद हुआ कि कौन श्रेष्ठ है।
तभी महेश ने अग्नि-स्तंभ का रूप धारण कर कहा कि जो इस स्तंभ का आदि और अंत खोज ले, वही श्रेष्ठ होगा।
विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार कर ली,
लेकिन ब्रह्मा जी ने अहंकारवश असत्य का सहारा लिया।
यह कथा केवल पौराणिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संकेत है।
अहंकार सृजन का परिणाम है।
जहाँ सृजन है, वहाँ “मैं” है।
और जहाँ “मैं” है, वहाँ पूजा की पात्रता समाप्त हो जाती है।
तीसरा कारण: शाप की पौराणिक व्याख्या (आंतरिक अर्थ)
कई ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मा जी को शाप मिला कि उनकी पूजा नहीं होगी।
लेकिन Adhyatmik Shakti के दृष्टिकोण से इसे बाहरी शाप नहीं, बल्कि कर्म-सिद्धांत के रूप में समझना चाहिए।
सृजन से जुड़ा प्रत्येक कर्म बंधन उत्पन्न करता है।
ब्रह्मा जी स्वयं कर्मचक्र के आरंभकर्ता हैं।
इसलिए वे कर्मफल से ऊपर नहीं हैं।
चौथा कारण: ब्रह्मा तत्व बाहरी नहीं, आंतरिक है
एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य यह है कि—
ब्रह्मा कोई बाहरी देवता नहीं, बल्कि चेतना की प्रथम अवस्था हैं।
जब मनुष्य सोचता है, योजना बनाता है, इच्छा करता है —
वह ब्रह्मा तत्व में होता है।
लेकिन पूजा तब होती है, जब मनुष्य स्वयं को अर्पित करता है।
जिसे तुम स्वयं जी रहे हो, उसकी पूजा नहीं कर सकते।
पाँचवाँ कारण: काम, रजोगुण और सृष्टि
ब्रह्मा जी को रजोगुण का प्रतीक माना गया है।
रजोगुण का अर्थ है — गति, इच्छा, कामना।
लेकिन साधना का अंतिम लक्ष्य है—
तमोगुण का त्याग
रजोगुण का शमन
सत्त्वगुण का उदय
इसलिए साधक रजोगुण के देवता की नहीं,
बल्कि उससे ऊपर उठाने वाली शक्ति की आराधना करता है।
छठा कारण: ब्रह्मा पूजा से मोक्ष नहीं, संसार बढ़ता है
यदि केवल ब्रह्मा पूजा व्यापक होती, तो—
संसार बढ़ता
इच्छाएँ बढ़तीं
जन्म-मरण का चक्र तेज़ होता
सनातन धर्म का उद्देश्य संतुलन और मुक्ति है,
न कि अनंत सृजन।
इसलिए परंपरा ने स्वाभाविक रूप से ब्रह्मा पूजा को सीमित रखा।
पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर: एक अपवाद क्यों?
राजस्थान का पुष्कर ब्रह्मा मंदिर एक अपवाद है।
लेकिन ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि—
वहाँ ब्रह्मा जी को सृष्टिकर्ता के रूप में नहीं,
बल्कि तपस्वी और वैरागी रूप में पूजा जाता है।
यह मंदिर भी यह सिखाता है कि
ब्रह्मा तभी पूज्य हैं, जब वे सृजन से ऊपर उठते हैं।
आध्यात्मिक निष्कर्ष: ब्रह्मा पूजा क्यों नहीं?
संक्षेप में कहा जाए तो—
ब्रह्मा जी सृजन के देवता हैं, मोक्ष के नहीं
सृजन कर्म से जुड़ा है, और कर्म बंधन लाता है
अहंकार और इच्छा ब्रह्मा तत्व की सीमाएँ हैं
साधना का लक्ष्य बंधन तोड़ना है, बढ़ाना नहीं
इसलिए परंपरा ने स्वाभाविक रूप से ब्रह्मा पूजा को सीमित रखा
Adhyatmik Shakti का दिव्य संदेश
Adhyatmik Shakti यह सिखाती है कि
पूजा केवल मूर्ति की नहीं होती,
पूजा चेतना की दिशा बदलने की प्रक्रिया है।
ब्रह्मा जी हमें सिखाते हैं कैसे संसार बना,
लेकिन उपासना हमें सिखाती है कैसे संसार से ऊपर उठा जाए।
अंतिम विचार
ब्रह्मा जी की पूजा न होना कोई अपमान नहीं,
बल्कि सनातन धर्म की अत्यंत परिपक्व आध्यात्मिक समझ का प्रमाण है।
जहाँ अधिकांश धर्म सृजन को अंतिम सत्य मानते हैं,
वहीं सनातन धर्म मुक्ति को अंतिम सत्य मानता है।
यही कारण है कि ब्रह्मा जी पूज्य होकर भी
उपास्य नहीं बने।


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