क्या भगवान सच में मंदिर में रहते हैं इसका उत्तर आपको हैरान कर देगा
क्या भगवान सच में मंदिर में रहते हैं या यह केवल हमारी मान्यता है शास्त्र संत और अनुभव के आधार पर जानिए इस प्रश्न का गूढ़ और चौंकाने वाला उत्तर
SPIRITUALITY
1/18/20261 min read
भूमिका मंदिर और भगवान के बीच का सबसे बड़ा भ्रम
बचपन से हमें सिखाया जाता है कि
भगवान मंदिर में रहते हैं
जब दुख हो तो मंदिर जाओ
जब मन अशांत हो तो मंदिर जाओ
जब कुछ पाना हो तो मंदिर जाओ
धीरे-धीरे हमारे मन में यह विश्वास बैठ जाता है कि
भगवान का स्थायी पता मंदिर है
लेकिन क्या आपने कभी यह प्रश्न स्वयं से पूछा है
अगर भगवान मंदिर में ही रहते हैं
तो बाहर की दुनिया में अन्याय
पीड़ा
असमानता
और क्रूरता क्यों है
यह प्रश्न असुविधाजनक है
पर आवश्यक है
आज इसी प्रश्न को हम गहराई से समझेंगे
मंदिर क्यों बने मनुष्य की आवश्यकता या भगवान की
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मंदिर क्यों बने
मंदिर भगवान ने नहीं बनाए
मनुष्य ने बनाए
मंदिर मनुष्य की आस्था का रूप हैं
डर
आशा
विश्वास
और प्रेम का स्थायी प्रतीक
जब मनुष्य ने स्वयं को असहाय महसूस किया
तब उसने ईश्वर की कल्पना की
और उस कल्पना को एक स्थान दिया
मंदिर भगवान के लिए नहीं
मनुष्य के मन के लिए बने
क्या शास्त्र कहते हैं कि भगवान मंदिर में रहते हैं
यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि
अधिकांश प्राचीन शास्त्र कहीं भी यह नहीं कहते कि भगवान केवल मंदिर में रहते हैं
उपनिषद स्पष्ट कहते हैं
ईश्वर सर्वत्र है
गीता में कहा गया है
भगवान हर जीव के हृदय में स्थित हैं
वेद कहते हैं
ईश्वर आकाश में है
पृथ्वी में है
जल में है
और चेतना में है
कहीं भी यह नहीं कहा गया कि
भगवान केवल एक इमारत में सीमित हैं
मूर्ति और भगवान के बीच का अंतर
मूर्ति एक माध्यम है
लक्ष्य नहीं
मूर्ति मन को एकाग्र करने का साधन है
परंतु समस्या तब आती है
जब हम मूर्ति को ही भगवान समझ लेते हैं
मूर्ति स्थिर है
पर भगवान चेतना हैं
मूर्ति सीमित है
पर भगवान असीम हैं
जब हम मूर्ति को भगवान मान लेते हैं
तो हम अनजाने में भगवान को सीमित कर देते हैं
संत क्या कहते हैं मंदिर और भगवान के बारे में
संत कबीर कहते हैं
पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़
यह वाक्य मंदिर के विरोध में नहीं
अंधी आस्था के विरोध में है
गुरु नानक कहते हैं
ईश्वर बाहर नहीं भीतर खोजो
मीरा कहती हैं
मेरा गिरधर मेरे हृदय में बसता है
सभी संत एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं
भगवान मंदिर में नहीं
मानव के भीतर रहते हैं
अगर भगवान मंदिर में ही रहते हैं तो बाहर क्या है
यह प्रश्न बहुत कठोर है
पर सच्चा है
अगर भगवान मंदिर में ही रहते हैं
तो क्या बाहर अधर्म का राज्य है
क्या भगवान केवल घंटियों और धूप के बीच सुरक्षित हैं
और भूख
बलात्कार
युद्ध
और अन्याय बाहर छोड़ दिए गए हैं
नहीं
भगवान मंदिर में कैद नहीं हैं
वे हर उस स्थान पर हैं
जहाँ सत्य है
जहाँ करुणा है
जहाँ प्रेम है
मंदिर की वास्तविक भूमिका क्या है
मंदिर का उद्देश्य भगवान को रखना नहीं
मनुष्य को बदलना है
मंदिर वह स्थान है
जहाँ मन शांत हो
अहंकार झुके
और भीतर देखने की प्रेरणा मिले
यदि मंदिर से बाहर निकलने के बाद
हम वही क्रोध
वही लोभ
वही घृणा लेकर चलते हैं
तो मंदिर केवल एक इमारत बनकर रह जाता है
भगवान को क्यों लगता है कि वे मंदिर में ही हैं
क्योंकि मनुष्य
डर के समय मंदिर जाता है
लालच के समय मंदिर जाता है
पर प्रेम के समय नहीं
हम भगवान को
एक सौदे की तरह देखते हैं
मैं मंदिर आया
आप मेरी इच्छा पूरी करो
इस सोच में भगवान एक व्यापारी बन जाते हैं
और मंदिर बाजार
भगवान और चेतना का संबंध
भगवान चेतना हैं
और चेतना किसी दीवार में नहीं बंद होती
आपका विवेक
आपकी करुणा
आपका मौन
वही ईश्वर की उपस्थिति है
जब आप किसी को बिना कारण माफ करते हैं
वहाँ भगवान होते हैं
जब आप किसी भूखे को भोजन देते हैं
वहाँ भगवान होते हैं
मंदिर में नहीं
कर्म में
क्या मंदिर जाना गलत है
नहीं
मंदिर जाना गलत नहीं
पर मंदिर में अटक जाना गलत है
मंदिर से प्रेरणा लेकर
जीवन में परिवर्तन लाना ही सही भक्ति है
यदि मंदिर आपके भीतर प्रेम बढ़ाता है
तो वह सही है
यदि वह घमंड बढ़ाता है
तो वह अधूरा है
आज के समय में मंदिर और भगवान
आज मंदिर बढ़ रहे हैं
पर करुणा घट रही है
यह संकेत है कि
हमने मंदिर को समझा
भगवान को नहीं
भगवान आज भी वहीं हैं
जहाँ पीड़ा है
जहाँ अन्याय है
जहाँ अकेलापन है
यदि आप वहाँ प्रेम लेकर पहुँचते हैं
तो आप ही भगवान के प्रतिनिधि बन जाते हैं
हैरान कर देने वाला सत्य
अब उस सत्य पर आते हैं
जो वास्तव में हैरान कर देता है
भगवान मंदिर में नहीं रहते
बल्कि मंदिर भगवान के भीतर रहता है
मंदिर एक प्रतीक है
अंत नहीं
भगवान का वास्तविक निवास
मानव हृदय की पवित्रता है
अंतिम विचार
भगवान को खोजने के लिए
कहीं जाने की आवश्यकता नहीं
बल्कि
भीतर उतरने की आवश्यकता है
जब आप स्वयं से मिलते हैं
तभी ईश्वर से मिलते हैं
मंदिर आपको द्वार तक लाता है
पर प्रवेश आपको स्वयं करना होता है


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