अगर हमें भगवान ने बनाया है, तो भगवान को किसने बनाया है?

अगर ईश्वर ने इस सृष्टि को बनाया है, तो ईश्वर को किसने बनाया? यह प्रश्न हजारों वर्षों से मानव मन को मथता रहा है। अगर हमें भगवान ने बनाया है, तो भगवान को किसने बनाया है?

SPIRITUALITY

1/17/20261 min read

भूमिका: एक प्रश्न जो हर जागरूक मन में उठता है

मनुष्य जब भी सोचने लगता है, प्रश्न पूछने लगता है।
और जब मनुष्य अस्तित्व के बारे में सोचता है, तो सबसे पहला प्रश्न यही होता है:

अगर हमें भगवान ने बनाया है, तो भगवान को किसने बनाया है?

यह प्रश्न बचकाना नहीं है।
यह प्रश्न नास्तिकता नहीं है।
यह प्रश्न ईश्वर का अपमान भी नहीं है।

यह प्रश्न चेतना के जागरण का पहला संकेत है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब मानव ने इस प्रश्न को दबाया, वह अंधविश्वास की ओर गया।
और जब-जब इस प्रश्न को समझने का प्रयास किया, वहीं से धर्म, दर्शन और अध्यात्म की शुरुआत हुई।

अध्याय 1: “बनाया जाना” – यह विचार कहाँ से आया?

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हम “बनाया जाना” किस संदर्भ में सोचते हैं।

हम मानते हैं:

  • घर किसी ने बनाया

  • मूर्ति किसी ने बनाई

  • मशीन किसी ने बनाई

इसलिए हमारा मन यह मान लेता है कि:

जो भी है, उसे किसी ने बनाया होगा

लेकिन यहाँ एक बुनियादी भ्रम है।

🔹 सृष्ट वस्तु और स्वयंसिद्ध तत्व में अंतर

हर वह चीज़ जो:

  • समय में बनी

  • समय में बदलेगी

  • समय में नष्ट होगी

वह सृष्ट (Created) है।

लेकिन जो:

  • समय से पहले भी था

  • समय के दौरान भी है

  • समय के बाद भी रहेगा

वह स्वयंसिद्ध (Self-existent) है।

यहीं पर भगवान का स्वरूप समझना आवश्यक हो जाता है।

अध्याय 2: सनातन दर्शन क्या कहता है?

सनातन धर्म में भगवान को “किसी व्यक्ति” के रूप में नहीं, बल्कि तत्व के रूप में देखा गया है।

उपनिषद स्पष्ट कहते हैं:

न जायते म्रियते वा कदाचित्
वह न जन्म लेता है, न मरता है।

भगवान को सनातन ग्रंथों में कहा गया है:

  • अजन्मा (जिसका जन्म नहीं हुआ)

  • अविनाशी

  • अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं)

🔹 अगर भगवान का जन्म हुआ होता, तो वे भगवान नहीं होते

क्योंकि:

  • जन्म = सीमा

  • सीमा = निर्भरता

  • निर्भरता = ईश्वर नहीं

अध्याय 3: “भगवान” शब्द का सही अर्थ

आज हम “भगवान” को एक आकृति, एक मूर्ति, या एक रूप में सीमित कर देते हैं।
जबकि सनातन परंपरा में भगवान का अर्थ है:

जो सबका कारण है, पर स्वयं अकारण है

वेद कहते हैं:

यस्य कारणं न विद्यते
जिसका कोई कारण नहीं है

यही कारण है कि भगवान को “पहला कारण” नहीं कहा गया, बल्कि कारणों से परे कारण कहा गया।

अध्याय 4: अगर भगवान को भी किसी ने बनाया हो, तो?

अब प्रश्न को आगे बढ़ाते हैं।

मान लीजिए:

  • भगवान को किसी ने बनाया

तो प्रश्न उठेगा:

  • उस बनाने वाले को किसने बनाया?

फिर:

  • उसके बनाने वाले को किसने बनाया?

यह एक अनंत श्रृंखला (Infinite Regression) बन जाती है, जिसका कोई अंत नहीं।

दर्शन शास्त्र में इसे अस्वीकार्य माना गया है।

इसलिए एक बिंदु ऐसा होना ही चाहिए जो:

  • बिना बनाए हुए हो

  • स्वयं में पूर्ण हो

  • समय और कारण से परे हो

उसी को ईश्वर तत्व कहा गया।

अध्याय 5: विज्ञान क्या कहता है?

विज्ञान भी आज उसी बिंदु पर आकर रुक जाता है।

बिग बैंग थ्योरी कहती है:

  • समय और स्थान की शुरुआत हुई

लेकिन विज्ञान आज भी यह नहीं बता पाता:

बिग बैंग से पहले क्या था?

यही वह बिंदु है जहाँ विज्ञान मौन हो जाता है
और अध्यात्म आरंभ होता है।

सनातन दर्शन पहले ही कह चुका है:

समय और स्थान स्वयं ईश्वर से उत्पन्न हैं

अध्याय 6: उपनिषदों का उत्तर

उपनिषद पूछते हैं:

कोऽद्धा वेद क इह प्र वोचत्?
कौन सच में जानता है?

उत्तर आता है:

नेति नेति — न यह, न वह

अर्थात:

  • ईश्वर को वस्तु की तरह समझा नहीं जा सकता

  • वे अनुभव हैं, परिभाषा नहीं

अध्याय 7: मूर्ति पूजा और यह प्रश्न

अक्सर लोग कहते हैं:
“अगर भगवान अजन्मा है, तो मूर्ति क्यों?”

समझिए:

  • मूर्ति भगवान नहीं है

  • मूर्ति ध्यान का माध्यम है

जैसे:

  • नक्शा देश नहीं होता

  • पर दिशा दिखाता है

उसी तरह मूर्ति:

  • चेतना को केंद्रित करती है

  • भगवान को सीमित नहीं करती

अध्याय 8: नास्तिकों का प्रश्न और उसका उत्तर

नास्तिक पूछता है:

अगर भगवान है, तो दिखाओ

सनातन उत्तर देता है:

क्या तुम अपने विचार दिखा सकते हो?

भगवान:

  • देखने की वस्तु नहीं

  • अनुभव की स्थिति हैं

अध्याय 9: अद्वैत दर्शन क्या कहता है?

अद्वैत वेदांत कहता है:

अहं ब्रह्मास्मि
मैं ही ब्रह्म हूँ

अर्थात:

  • खोज बाहर नहीं

  • खोज भीतर है

भगवान कोई दूर बैठा शासक नहीं
बल्कि चेतना का मूल स्रोत हैं।

अध्याय 10: भगवान को समझने की अंतिम सीमा

भगवान को समझने का प्रयास तब तक चलता है
जब तक “मैं” बना रहता है।

जिस दिन “मैं” विलीन होता है,
उस दिन प्रश्न भी विलीन हो जाता है।

यही कारण है कि ऋषि:

  • प्रश्नों के उत्तर नहीं देते

  • अनुभव की ओर ले जाते हैं

अध्याय 11: Adhyatmik Shakti का दृष्टिकोण

Adhyatmik Shakti का उद्देश्य भी यही है—
भगवान को विवाद का विषय नहीं,
बल्कि आत्म-अनुभव का माध्यम बनाना।

यह मंच:

  • अंधविश्वास नहीं सिखाता

  • नास्तिकता से युद्ध नहीं करता

  • बल्कि चेतना को प्रश्न पूछने का साहस देता है

अध्याय 12: अंतिम और सबसे गहरा उत्तर

❝ अगर हमें भगवान ने बनाया है, तो भगवान को किसने बनाया? ❞

इसका उत्तर है:

भगवान बनाए नहीं गए, भगवान “हैं”

वे:

  • समय से पहले हैं

  • कारण से परे हैं

  • चेतना का मूल हैं

और जिस दिन यह बात केवल समझ में नहीं,
अनुभव में उतर जाती है,
उस दिन यह प्रश्न स्वयं समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष

यह प्रश्न पूछना पाप नहीं।
यह प्रश्न दबाना अज्ञान है।

भगवान को जानने का मार्ग
विश्वास से नहीं,
चेतना से होकर गुजरता है।

और वही मार्ग
सनातन धर्म, उपनिषद, वेद
और Adhyatmik Shakti जैसे मंच दिखाते हैं।